सरदार पटेल ने 562 रियासतों को कैसे बनाया अखंड भारत का हिस्सा? अमित शाह ने बताया एकीकरण का इतिहास, कांग्रेस पर साधा निशाना

नई दिल्ली: राष्ट्रीय एकता दिवस और लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती के अवसर पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। इस मौके पर उन्होंने देश के एकीकरण में सरदार पटेल के ऐतिहासिक योगदान को याद करते हुए कहा कि आजादी के बाद उन्होंने महज 1,218 दिनों में वह काम कर दिखाया, जिसे उस समय दुनिया के कई राजनीतिक जानकार असंभव मान रहे थे। शनिवार सुबह अमित शाह और दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने मेजर ध्यानचंद राष्ट्रीय स्टेडियम में आयोजित ‘रन फॉर यूनिटी’ को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। इस दौरान शाह ने सरदार पटेल के योगदान के साथ देश की एकता और अखंडता को लेकर भी अपनी बात रखी।

सरदार पटेल ने बदल दिया देश का भूगोल: अमित शाह

सरदार वल्लभभाई पटेल को याद करते हुए अमित शाह ने कहा कि उन्होंने सिर्फ देश के इतिहास को ही नहीं बदला, बल्कि भारत के भूगोल को भी नई पहचान दी। उन्होंने अलग-अलग रियासतों और राज्यों को एक सूत्र में पिरोकर अखंड भारत की नींव मजबूत की। शाह के मुताबिक, सरदार पटेल ने देश के भौगोलिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक एकीकरण के लिए असाधारण प्रयास किए। उनकी दूरदर्शिता और दृढ़ इच्छाशक्ति के चलते अलग-अलग रियासतों को एकजुट कर भारत को एक मजबूत राष्ट्र के रूप में स्थापित करने का रास्ता तैयार हुआ।

1,218 दिनों में कर दिखाया असंभव काम

गृह मंत्री ने कहा कि आजादी के समय दुनिया के कई राजनीतिक विशेषज्ञों को लगता था कि भारत लंबे समय तक एकजुट नहीं रह पाएगा और अलग-अलग हिस्सों में बिखर जाएगा। लेकिन सरदार पटेल ने स्वतंत्रता के बाद महज 1,218 दिनों में ऐसा काम कर दिखाया, जिसे असंभव माना जा रहा था। शाह ने कहा कि इस तरह का काम कई नेता मिलकर भी शायद अपने पूरे जीवनकाल में नहीं कर पाते। सरदार पटेल ने अपनी इच्छाशक्ति और नेतृत्व क्षमता से इसे बेहद कम समय में पूरा किया। आज उनका परिकल्पित और निर्मित भारत पूरी दुनिया के सामने गर्व के साथ खड़ा है।

नशामुक्त भारत के लिए 31 दिसंबर 2029 तक का लक्ष्य

अमित शाह ने देश में नक्सलवाद के खिलाफ मिली सफलता का जिक्र करते हुए कहा कि इस साल 31 मार्च को देश नक्सलवाद से मुक्त होने की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि हासिल कर चुका है। उन्होंने राष्ट्रीय एकता दिवस के अवसर पर देशवासियों से 31 दिसंबर 2029 तक भारत को पूरी तरह नशामुक्त बनाने के लक्ष्य में सहयोग करने की अपील की। शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विकसित भारत का जो सपना देखा है, उसे साकार करने की दिशा में नशामुक्त भारत का निर्माण पहला महत्वपूर्ण चरण है।

सरदार पटेल को उचित सम्मान नहीं देने का कांग्रेस पर आरोप

कांग्रेस पर निशाना साधते हुए अमित शाह ने आरोप लगाया कि पार्टी ने लंबे समय तक सरदार वल्लभभाई पटेल को उनके योगदान के अनुरूप सम्मान नहीं दिया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने हमेशा उन्हें भुलाने की कोशिश की, लेकिन किसी महान व्यक्तित्व की उपलब्धियों को छिपाया नहीं जा सकता। शाह ने कहा कि जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बने, तब उन्होंने सरदार पटेल की स्मृति और उनके योगदान को राष्ट्रीय पहचान दिलाने के लिए स्टैच्यू ऑफ यूनिटी का निर्माण कराया। यह विशाल प्रतिमा सरदार पटेल के व्यक्तित्व और देश के प्रति उनके योगदान को सम्मान देने का प्रतीक है।

आजादी के बाद 562 रियासतों को भारत में मिलाना थी बड़ी चुनौती

जब 1947 में भारत स्वतंत्र हुआ, उस समय देश में 560 से अधिक रियासतें मौजूद थीं। इन सभी रियासतों को एक साथ भारतीय संघ का हिस्सा बनाना नवगठित देश के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक था। सरदार वल्लभभाई पटेल ने इस जिम्मेदारी को संभालते हुए रियासतों के भारत में विलय की प्रक्रिया शुरू की। इस महत्वपूर्ण कार्य में तत्कालीन रियासत विभाग के सचिव वीपी मेनन ने भी उनका सहयोग किया। दोनों ने मिलकर रियासतों के शासकों से बातचीत की और भारतीय संघ में शामिल होने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया। इसके लिए इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन यानी विलय-पत्र को प्रमुख आधार बनाया गया। इसी प्रयास के जरिए अलग-अलग रियासतों को भारत के साथ जोड़कर राष्ट्रीय एकीकरण की दिशा में ऐतिहासिक कदम उठाया गया।

इसलिए सरदार वल्लभभाई पटेल कहलाए भारत के लौह पुरुष

सरदार वल्लभभाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को गुजरात के नडियाद में हुआ था। वर्ष 1928 में बारडोली सत्याग्रह का नेतृत्व करने के बाद उन्हें सरदार की उपाधि मिली। स्वतंत्रता के बाद उन्होंने देश के पहले उपप्रधानमंत्री और गृह मंत्री के रूप में जिम्मेदारी संभाली। देश की सैकड़ों रियासतों को भारतीय संघ में शामिल कराने और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने में उनकी निर्णायक भूमिका रही। उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति, नेतृत्व क्षमता और राष्ट्र के प्रति समर्पण के कारण उन्हें भारत का लौह पुरुष कहा जाता है। 15 दिसंबर 1950 को उनका निधन हो गया।

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